Know about The Great Ashoka- अशोक महान

ashoka 123x150 Know about The Great Ashoka  अशोक महानविश्व इतिहास में कई महानायक हुए हैं जिनकी कीर्ति विश्व में फैली। एक इतिहासकार के अनुसार ‘किसी व्यक्ति के यश और प्रसिद्धि को मापने का मापदंड असंख्‍य लोगों का हृदय है – जो उसकी पवित्र स्मृति को सजीव रखता है और जो अगणित मनुष्यों की वह जिह्वा है जो उसकी कीर्ति का गान करती है। उन्हें विश्व इतिहास में ‘महान’ की उपाधि से विभूषित किया है। आज भी इतिहास ग्रंथों में उनका नाम इसी उपाधि के साथ प्रत्यय के साथ मिलता है। ‘महान’ कही जाने वाली ये तीन‍ विभूतियाँ हैं अशोक महान, सिकंदर महान और अकबर महान। यहाँ प्रस्तुत है अशोक महान के प्रेरक चरित्र एवं आदर्शों की संक्षिप्त झाँकी। सम्राट अशोक मौर्यवंश का तीसरा राजा था। उसके पिता का नाम बिंदुसार और माता का जनपद कल्याणी था। अशोक का जन्म लगभग 297 ई. पूर्व माना गया है। अशोक का साम्राज्य प्राय: संपूर्ण भारत और पश्चिमोत्तर में हिंदुकुश एवं ईरान की सीमा तक था। कलिंग के भीषण युद्ध ने अशोक के हृदय पर बड़ा आघात पहुँचाया और उसने अपनी हिंसा आधारित दिग्विजय की नीति छोड़कर, धर्म विजय की नीति को अपनाया। लगभग इसी समय अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। अब सम्राट अशोक शासक और संत-दोनों का मिश्रित चरित्र था। उसने अपने साम्राज्य के सभी साधकों को लोकमंगल के कार्यों में लगा दिया था। अशोक की राजनीति धर्म और नीति से पूर्णत: प्रभावित थी। अशोक का आदर्श था – ‘लोकहित से बढ़कर दूसरा और कोई कर्म नहीं है जो कुछ मैं पुरुषार्थ करता हूँ, वह लोगों पर उपकार नहीं, अपितु इसलिए कि मैं उनमें उऋण हो जाऊँ और उनको इहलौकिक सुख और परमार्थ प्राप्त कराऊँ।’ अशोक जनता में अत्यधिक लोकप्रिय था। वह जनता को अपनी संतान के समान स्नेह करता था। जनता का सुख-दुख जानने के लिए वह वेश बदलकर भ्रमण किया करता था जिसे वह जनता के संपर्क में आकर उसके सुख को समझने का अवसर पाता था। अशोक अपनी प्रजा की भौतिक एवं नैतिक दोनों प्रकार की उन्नति चाहता था। इस कारण वह अपने शासन में नैतिकता को अधिक बल देता था। अशोक को धर्म प्रचार के लिए, इतिहास में अधिक जाना जाता है। वह अपने धर्म प्रचार में नैतिक सिद्धांतों पर ही जोर देता था – इससे सभी धर्मों के बीच संतुलन बनाने में सरलता होती थी। अशोक ने धर्म प्रचार के लिए, नैतिक उपदेशों को प्रजा तक पहुँचाने के लिए धर्म लेखों का सहारा लिया था जो पर्वत शिखाओं, पत्‍थर के खंभों और गुफाओं में अंकित किए गए गए। अशोक ने तीन वर्ष की अवधि में चौरासी हजार स्तूपों का निर्माण कराया। इनमें सारनाथ (वाराणसी के निकट) में उसके द्वारा निर्मित स्तूप के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। अशोक ने देश के विभिन्न भागों में, प्रमुख राजपथों और मार्गों पर धर्म स्तंभ स्थापित किए। इनमें सारनाथ का सिंह शीर्ष स्तंभ सबसे अधिक प्रसिद्ध है। यह धर्मचक्र की घटना का स्मारक था। सारनाथ की सिंह मुद्रा को भारत सरकार का राज्य चिह्न स्वीकार किया गया है। अशोक संसार के उन सम्राटों में था जिसने धर्म-विजय के द्वारा संपूर्ण देश एवं पड़ोसी देशों में अहिंसा, शांति, मानव कल्याण एवं मानव प्रेम का संदेश जन-जन तक पहुँचाया। इसी के साथ अशोक की धर्म विजय में लोकोपकारी कार्यों का समावेश भी हुआ। सड़कों का निर्माण, उसके किनारे वृक्षों का आरोपण, विश्राम शालाओं और प्याऊ निर्माण, सुरक्षा आदि का समुचित प्रबंध था। जनता सुखी एवं धर्मपरायण थी। अशोक ने पूरे विश्व में बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ शांति, अहिंसा एवं प्रेम का जो व्यापक प्रचार किया, उससे उसे सर्वत्र प्रशंसा मिली। अशोक के समय में पूरे विश्व में युद्ध, रक्तपात, हिंसा और अराजकता का साम्राज्य था। अशोक ने ऐसे उथलपुथल वाले सागर में अमृत बिंदु का काम किया और विश्व में शांति स्थापित की, नैतिक मूल्यों की स्थापना की और सबको विश्वबंधुत्व एवं प्रेम का संदेश दिया। इस तरह अशोक पूरे विश्व में यशस्वी बना – उसे ‘अशोक महान’ कहा गया।